बड़ा अँधेरा है सड़क पर
कोई रौशन करता तो अच्छा था.
जाना कहाँ है पता नहीं
कोई राह दिखाता तो अच्छा था.
अरमानों की धुंध बड़ी है
कोई लक्ष्य दिखाता तो अच्छा था.
जाने किस "कोई" के इंतज़ार में खड़ा है तू
जो मैं समझ पाता तो अच्छा था.
मैं ही तो एक मात्र व्याप्त हूँ
जो तू समझ पाता तो अच्छा था.
खैर खता तेरी नहीं, मेरी ही है
जो तुझे देखने को संसार दिया.
मैंने रौशनी दिखाई और तुने अँधेरे का आविष्कार किया !
अरे पागल! आँखे बंद करे तू थोड़ी, तो मैं थोडा रास्ता दिखलाऊँ !
मन-रंजन को दिए थे सपने,
तुने खुद को ही रंग डाला
अब कहता है धुंध बड़ी है - अति सेवन ही बन गयी हाला !
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